चुड़ैल का ख़ज़ाना

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एक बहुत ही सुंदर गाँव था। उस गाँव में एक दादी माँ रहा करती थी। जिसकी उम्र तक़रीबन 90 वर्ष की थी। गाँव के सारे बच्चे रोज़ उसे कहानी सुनने की ज़िद किया करते थे। और वह सभी बच्चों को साथ में बैठाकर तरह तरह की कहानियां सुनाया करती थी। एक बार की बात है एक लड़का दादी माँ से ज़िद करने लगता है कि, मुझे आज डरावनी चुड़ैल की कहानियाँ सुननी है। लेकिन दादी माँ उन बच्चों को तो भूत की कहानी नहीं सुनाना चाहती। उन्हें लगता है, कहीं बच्चों के मन में डर न भर जाए। लेकिन सभी बच्चे दादी माँ से ज़िद करने लगते हैं। तभी दादी माँ कहानी सुनाना शुरू करती है।

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एक जंगल में एक पहाड़ी थी। वहाँ एक डरावनी चुड़ैल रहा करती थी। उस पहाड़ी में एक छोटा सा खंडहर था। उसी खंडहर के अंदर चुड़ैल का ख़ज़ाना छिपा था। जिसमें बहुत से रत्न, हीरे, मोती, जवाहरात और महिलाओं के बहुत से आभूषण भी थे। वह चुड़ैल, ख़ज़ाने की रक्षा करने के लिए उस जंगल में भय का माहौल बनाए रहती थी। ताकि कोई उस खंडहर के क़रीब न आ सके। लेकिन एक दिन एक लकड़हारा लकड़ी काटने के लिए उस जंगल में प्रवेश कर गया, और जलाऊ लकड़ी की तलाश में जंगल के मध्य भाग तक पहुँच गया। जहाँ उस चुड़ैल का खंडहर बना था।

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खंडहर के आस पास बहुत सी सूखी लकड़ियाँ पड़ी हुई थी। उसने सोचा कि इससे उत्तम जलाऊ लकड़ी तो कोई हो ही नहीं सकती, जो पूरी तरह सूखी हुई थी। वह लकड़हारा खंडहर की सीढ़ियों से लकड़ियाँ इकट्ठा करता हुआ आगे बढ़ता गया। जैसे ही वह द्वार तक पहुँचा। वहाँ एक बहुत ही विशाल दरवाज़ा था। जो पूरी तरह लकड़ी का बना हुआ था। लकड़हारे ने आज से पहले इतनी ख़ूबसूरत कारीगरी कभी नहीं देखी थी। जैसे ही उसने उस दरवाज़े को स्पर्श किया है। उसे अजीब सा एहसास हुआ उसे ऐसा लगा मानो कोई उसे अंदर बुला रहा हो। मदहोशी की हालत में लकड़हारा अंदर प्रवेश कर गया। खंडहर के अंदर जाते ही उसकी आँखें चकाचौंध हो गई। बड़े बड़े मिट्टी के बर्तनों में अशर्फ़ियाँ, सिक्के और हीरे जवाहरातों का भंडार था।

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लकड़हारे ने आज से पहले इतनी दौलत कभी नहीं देखी थी। स्वाभाविक है कोई भी इंसान इतना बड़ा ख़ज़ाना देखकर चकाचौंध ही होगा। तभी खंडहर के अंदर एक आहट के साथ दरवाज़ा बंद हो जाता है,और ज़ोर से हवाएँ चलने लगती है। लकड़हारा खंडहर में 1 खम्भे को पकड़कर अपनी जान बचाता है। तभी वह डरावनी चुड़ैल अपना भयानक रूप प्रकट करती है। यह देखते ही लकड़हारा बेहोश हो जाता है, और इसी हालत में लकड़हारे की एक रात गुज़र जाती है। और जब लकड़हारे को होश आता है, तो वहाँ चारों तरफ़ केवल पेड़ ही पेड़ दिखाई देते हैं। लकड़हारे को कुछ समझ नहीं आता, कि वह यहाँ कैसे पहुँचा। लकड़हारा अपने कुर्ते की जेब में हाथ डालता है, तो उसे एक सोने का सिक्का मिलता है।

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वह यह देखकर बहुत प्रसन्न हो जाता है, वह सोचता है, उसकी जान बच गई और उसे इतना बड़ा सिक्का भी मिल गया। जिससे उसका ख़र्चा तो चल ही जाएगा। और वह उत्साहित होकर अपने गाँव वापस बिना लकड़ियों के ही आ जाता है। घर में आकर सभी को यह बात बताता है। लेकिन उसके घर वाले कोई भी प्रतिक्रिया नहीं देते। उसे लगता है मैं इतनी ज़ोर ज़ोर से सबको अपनी बातें बता रहा हूँ, लेकिन कोई मेरी बातें सुन क्यों नहीं पा रहा। तभी वह पास में ही पड़े पानी के बर्तन में मुँह धोने के लिए हाथ डालता है, लेकिन वह पानी की एक बूँद को भी स्पर्श नहीं कर सकता। उसे कुछ समझ नहीं आता कि, वह अदृश्य हो गया है, या उसकी मृत्यु हो चुकी है। और तभी दादी माँ सभी बच्चों को नींद से जगाती हैं। दरअसल कहानी सुनते-सुनते सभी बच्चों को नींद आ चुकी थी। और जैसे ही सभी बच्चों की आँख खुलती है, तो सभी बच्चों के हाथ में एक-एक सोने के सिक्के होते हैं। और वह बच्चा जिसने दादी माँ से कहानी सुनने की ज़िद की थी। वह ग़ायब हो चुका होता है।

दादी माँ चारों तरफ़ उसकी तलाश करती है। लेकिन वह कहीं नहीं दिखाई देता। सभी बच्चे सोचते है आखिर वो गया कहाँ ? वह बच्चा “रहस्यमयी लड़का” बनकर रह जाता है।

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